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श्रीगायत्री कवचम्: सम्पूर्ण संस्कृत पाठ, श्लोकार्थ एवं फलश्रुति | cdsharma.in

✍️ CD Sharma · 📅 21 Sep 2026 · ⏱️ 1 मिनट का पठन · 🏷️ श्रीगायत्री कवच, Gayatri Kavacham, Shri Gayatri Kavach, Vishvamitra Samhita, Gayatri Mantra Sadhana, Veda Mata Gayatri, गायत्री रक्षा कवच, गायत्री स्तोत्र, सनातन धर्म, cdsharma.in

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श्रीगायत्री कवचम्: सम्पूर्ण संस्कृत पाठ, श्लोकार्थ एवं फलश्रुति | cdsharma.in

॥ श्री गायत्रीकवचम् ॥

(श्रीविश्वामित्रसंहितोक्तम्)

'श्री गायत्री कवचम्' समस्त प्रकार के अनिष्टों, भयों, ग्रहों के कुप्रभावों तथा रोगों से रक्षा करने वाला अमोघ सुरक्षा-कवच है। विश्वामित्र संहिता में ब्रह्मा जी ने महर्षि विश्वामित्र को इस परम गोपनीय कवच का उपदेश दिया था। गायत्री साधना एवं नित्य संध्या-वंदन से पूर्व या पश्चात इसका पाठ करने से साधक को दैहिक, दैविक और भौतिक तापों से पूर्ण सुरक्षा प्राप्त होती है।

विनियोग

हाथ में जल लेकर निम्नलिखित मंत्र का उच्चारण करें तथा जल भूमि पर छोड़ दें:

ॐ अस्य श्रीगायत्रीकवचस्य, ब्रह्मा ऋषिः, गायत्री छन्दः, गायत्री देवता, भूः बीजम्, भुवः शक्तिः, स्वः कीलकम्, गायत्री प्रीत्यर्थं जपे विनियोगः ।
  • ऋषि: ब्रह्मा
  • छन्द: गायत्री
  • देवता: भगवती गायत्री
  • बीज: भूः
  • शक्ति: भुवः
  • कीलक: स्वः
  • प्रयोजन: भगवती गायत्री की प्रसन्नता एवं आत्म-रक्षा हेतु।

ध्यानम्

पञ्चवक्त्रां दशभुजां सूर्यकोटिसमप्रभाम् । सावित्रीं ब्रह्म वरदां चन्द्रकोटिसुशीतलाम् ॥

त्रिनेत्रां सितवक्त्रां च मुक्ताहारविराजिताम् । वराभयाङ्कुशकशाहेमपत्राक्षमालिकाम् ॥

शङ्खचक्राब्जयुगलं कराभ्यां दधतीं वराम् । सितपङ्कजसंस्थां च हंसारूढां सुखस्मिताम् ॥

ध्यात्वैवं मानसाम्भोजे गायत्रीकवचं जपेत् ॥

  • हिन्दी अर्थ: जिनके पाँच मुख हैं, दस भुजाएँ हैं, जो करोड़ों सूर्यों के समान तेजस्वी तथा करोड़ों चंद्रमाओं के समान परम शीतल हैं; जो ब्रह्मा स्वरूपा, वरदायिनी, त्रिनेत्रधारिणी, श्वेत मुखमण्डल वाली तथा मोतियों के हार से सुशोभित हैं; जो अपने कर-कमलों में वरदमुद्रा, अभयमुद्रा, अंकुश, चाबुक, स्वर्णपात्र, रुद्राक्ष/अक्षमाला, शंख, चक्र तथा दो कमल धारण करती हैं; जो श्वेत कमल पर विराजमान, हंस पर आरूढ़ तथा मंद-मंद मुस्कान से युक्त हैं—ऐसी भगवती सावित्री-गायत्री का अपने हृदय-कमल में ध्यान करके इस पवित्र कवच का पाठ करना चाहिए।

मूल कवच पाठ एवं श्लोकार्थ

ॐ ब्रह्मोवाच । विश्वामित्र महाप्राज्ञ गायत्रीकवचं शृणु । यस्य विज्ञानमात्रेण त्रैलोक्यं वशयेत्क्षणात् ॥ १ ॥

  • अर्थ: ब्रह्मा जी बोले—हे परम ज्ञानी महर्षि विश्वामित्र! अब तुम गायत्री कवच का श्रवण करो, जिसके केवल जान लेने और पाठ करने मात्र से साधक क्षणभर में तीनों लोकों को वशीभूत (अनुकूल) करने में समर्थ हो जाता है।

सावित्री मे शिरः पातु शिखायाममृतेश्वरी । ललाटं ब्रह्मदैवत्या भ्रुवौ मे पातु वैष्णवी ॥ २ ॥

  • अर्थ: भगवती सावित्री मेरे मस्तक (सिर) की रक्षा करें, शिखा में अमृतेश्वरी रक्षा करें। ललाट (माथे) की रक्षा ब्रह्मदैवत्या करें और दोनों भौंहों की रक्षा वैष्णवी शक्ति करें।

कर्णौ मे पातु रुद्राणी सूर्या सावित्रिकाऽम्बिका । गायत्री वदनं पातु शारदा दशनच्छदौ ॥ ३ ॥

  • अर्थ: दोनों कानों की रक्षा रुद्राणी करें, नेत्रों की रक्षा सूर्य-स्वरूपा सावित्रिका अम्बिका करें। मुख की रक्षा स्वयं गायत्री देवी करें और दोनों ओष्ठों (होंठों) की रक्षा भगवती शारदा करें।

द्विजान् यज्ञप्रिया पातु रसनायां सरस्वती । साङ्ख्यायनी नासिकां मे कपोलौ चन्द्रहासिनी ॥ ४ ॥

  • अर्थ: दाँतों की रक्षा यज्ञप्रिया करें, जिह्वा (जीभ) पर सरस्वती वास करके रक्षा करें। नासिका (नाक) की रक्षा साङ्ख्यायनी करें और दोनों गालों की रक्षा चन्द्रहासिनी देवी करें।

चिबुकं वेदगर्भा च कण्ठं पात्वघनाशिनी । स्तनौ मे पातु इन्द्राणी हृदयं ब्रह्मवादिनी ॥ ५ ॥

  • अर्थ: चिबुक (ठोड़ी) की रक्षा वेदगर्भा करें, कण्ठ (गले) की रक्षा पाप-नाशिनी करें। दोनों स्तनों (वक्षस्थल) की रक्षा इन्द्राणी करें और हृदय की रक्षा ब्रह्मवादिनी करें।

उदरं विश्वभोक्त्री च नाभौ पातु सुरप्रिया । जघनं नारसिंही च पृष्ठं ब्रह्माण्डधारिणी ॥ ६ ॥

  • अर्थ: उदर (पेट) की रक्षा विश्वभोक्त्री करें, नाभि की रक्षा सुरप्रिया करें। जघन (कटि-नितम्ब) भाग की रक्षा नारसिंही शक्ति करें और पीठ की रक्षा ब्रह्माण्डधारिणी करें।

पार्श्वौ मे पातु पद्माक्षी गुह्यं गोगोप्त्रिकाऽवतु । ऊर्वोरोङ्काररूपा च जान्वोः सन्ध्यात्मिकावतु ॥ ७ ॥

  • अर्थ: दोनों पार्श्वों (पसलियों/बगलों) की रक्षा पद्माक्षी करें, गुह्य अंगों की रक्षा गोगोप्त्रिका करें। दोनों ऊरुओं (जांघों) की रक्षा ओंकाररूपा करें और दोनों घुटनों की रक्षा सन्ध्यात्मिका देवी करें।

जङ्घयोः पातु अक्षोभ्या गुल्फयोर्ब्रह्मशीर्षका । सूर्या पदद्वयं पातु चन्द्रा पादाङ्गुलीषु च ॥ ८ ॥

  • अर्थ: दोनों जंघाओं (पिंडलियों) की रक्षा अक्षोभ्या करें, दोनों टखनों (गुल्फों) की रक्षा ब्रह्मशीर्षका करें। दोनों पैरों के तलवों की रक्षा सूर्या करें और पैरों की समस्त अँगुलियों की रक्षा चन्द्रा देवी करें।

सर्वाङ्गं वेदजननी पातु मे सर्वदानघा । इत्येतत्कवचं ब्रह्मन् गायत्र्याः सर्वपावनम् । पुण्यं पवित्रं पापघ्नं सर्वरोगनिवारणम् ॥ ९ ॥

  • अर्थ: निष्पाप, परम पावन वेदमाता गायत्री मेरे सम्पूर्ण अंगों की सब ओर से सर्वदा रक्षा करें। हे ब्रह्मन्! इस प्रकार यह गायत्री का कवच परम पावन, महापुण्यदायी, परम पवित्र, समस्त पापों का नाश करने वाला तथा सब प्रकार के रोगों का निवारण करने वाला है।

फलश्रुति

त्रिसन्ध्यं यः पठेद्विद्वान् सर्वान् कामानवाप्नुयात् । सर्वशास्त्रार्थतत्वज्ञः स भवेद्वेदवित्तमः ॥ १० ॥

सर्वयज्ञफलं प्राप्य ब्रह्मान्ते समवाप्नुयात् । प्राप्नोति जपमात्रेण पुरुषार्थांश्चतुर्विधान् ॥ ११ ॥

॥ इति श्रीविश्वामित्रसंहितोक्तं गायत्रीकवचं सम्पूर्णम् ॥

  • हिन्दी अर्थ: जो विद्वान पुरुष तीनों संध्याओं (प्रातः, मध्याह्न, सायं) में अथवा नित्य नियमपूर्वक इस कवच का पाठ करता है, वह अपनी समस्त मनोकामनाओं को प्राप्त कर लेता है। वह सभी शास्त्रों के गूढ़ रहस्यों को जानने वाला और वेदों का श्रेष्ठ ज्ञाता बन जाता है। उसे समस्त यज्ञों के अनुष्ठान का अक्षय फल मिलता है और अंत समय में वह परब्रह्म परमात्मा को प्राप्त करता है। इसके नित्य पाठ व जप मात्र से मनुष्य धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष—इन चारों पुरुषार्थों को सहज ही सिद्ध कर लेता है।

पाठ विधि एवं लाभ

  • नित्य नियम: प्रातःकाल स्नानादि के उपरांत पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके कुशासन पर बैठें। गायत्री मंत्र जप से पहले या बाद में इस कवच का पाठ करना अत्यंत श्रेयस्कर होता है।
  • रक्षा घेरा: यह कवच नकारात्मक शक्तियों, भय, ऊपरी बाधाओं, तंत्र-दोष तथा आकस्मिक दुर्घटनाओं से साधक के शरीर के प्रत्येक अंग की रक्षा करता है।
  • विद्या एवं स्वास्थ्य लाभ: विद्यार्थियों के लिए यह मेधा-बुद्धि और एकाग्रता प्रदायक है तथा रोगियों के लिए दीर्घकालिक व्याधियों से मुक्ति दिलाने वाला माना गया है।

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