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🕉️ श्लोकार्थ-बोधिनी

॥ श्लोकानां विश्लेषिका ॥ — पदच्छेद, पदपरिचय, पदार्थ, अन्वय, भावार्थ व व्याकरण

मार्जयतु

🔔 मूलश्लोकः

विद्या ददाति विनयं विनयाद्याति पात्रताम् । पात्रत्वाद्धनमाप्नोति धनाद्धर्मं ततः सुखम् ॥

🌸 पदच्छेदः स्वचालित

विद्या।ददाति।विनयं।विनयात्+याति।पात्रताम्।पात्रत्वात्+धनम्+आप्नोति।धनात्+धर्मं।ततः।सुखम्

"+" = एक ही लिखित शब्द के भीतर सन्धि-विच्छेद · डैश (-) वाले = समास का पूर्वपद

🌹 पदपरिचयः स्वचालित

पदम्विवरणम्
विद्याविद्या (स्त्री.) — प्रथमा विभक्ति, एकवचन (व्युत्पत्ति: विद् + क्यप्)
अन्य सम्भावना: द्या (स्त्री.) — प्रथमा विभक्ति, एकवचन · कृदन्त: वि + द्यै + अच् | विद्या (पुं.) — तृतीया विभक्ति, एकवचन · कृदन्त: विद् + क्यप् | द्या (पुं.) — तृतीया विभक्ति, एकवचन · कृदन्त: वि + द्यै + अच्
ददातिदा धातु (जुहोत्यादिगण, परस्मैपद) — लट् लकार, प्रथम पुरुष, एकवचन
अन्य सम्भावना: ददाता (स्त्री.) — सप्तमी विभक्ति, एकवचन · तद्धित: ददा + तल् (भाववाचक)
विनयंविनय (नपुं.) — प्रथमा विभक्ति, एकवचन
अन्य सम्भावना: विनय (पुं.) — द्वितीया विभक्ति, एकवचन | विनय (नपुं.) — द्वितीया विभक्ति, एकवचन | नय (पुं.) — द्वितीया विभक्ति, एकवचन · कृदन्त: वि + नय् + अच्
विनयात्विनय (नपुं.) — पञ्चमी विभक्ति, एकवचन
अन्य सम्भावना: विनय (पुं.) — पञ्चमी विभक्ति, एकवचन | नय (पुं.) — पञ्चमी विभक्ति, एकवचन · कृदन्त: वि + नय् + अच्
यातिया धातु (अदादिगण, परस्मैपद) — लट् लकार, प्रथम पुरुष, एकवचन
अन्य सम्भावना: यात् (पुं.) — सप्तमी विभक्ति, एकवचन · कृदन्त: या + शतृ | यात् (नपुं.) — सप्तमी विभक्ति, एकवचन · कृदन्त: या + शतृ | याती (स्त्री.) — सम्बोधन, एकवचन · कृदन्त: या + शतृ
पात्रताम्पात्रता (स्त्री.) — द्वितीया विभक्ति, एकवचन · तद्धित: पात्र + तल् (भाववाचक)
अन्य सम्भावना: पात्रता (स्त्री.) — षष्ठी विभक्ति, बहुवचन · तद्धित: पात्र + तल् (भाववाचक)
पात्रत्वात्पात्रत्व (नपुं.) — पञ्चमी विभक्ति, एकवचन · तद्धित: पात्र + त्व (भाववाचक)
धनम्धन (नपुं.) — प्रथमा विभक्ति, एकवचन
अन्य सम्भावना: धन (नपुं.) — द्वितीया विभक्ति, एकवचन
आप्नोतिआप् धातु (स्वादिगण, परस्मैपद) — लट् लकार, प्रथम पुरुष, एकवचन
धनात्धन (नपुं.) — पञ्चमी विभक्ति, एकवचन
धर्मंधर्म (नपुं.) — प्रथमा विभक्ति, एकवचन
अन्य सम्भावना: धर्म (नपुं.) — द्वितीया विभक्ति, एकवचन | धर्म (पुं.) — द्वितीया विभक्ति, एकवचन
ततःअव्ययम्
अन्य सम्भावना: तत (पुं.) — प्रथमा विभक्ति, एकवचन · कृदन्त: तन् + क्त
सुखम्सुख (नपुं.) — प्रथमा विभक्ति, एकवचन
अन्य सम्भावना: सुख (नपुं.) — द्वितीया विभक्ति, एकवचन | अव्यय — सुख + णमुल् (पूर्वकालिक/आभीक्ष्ण्य अव्यय) | सुख (पुं.) — द्वितीया विभक्ति, एकवचन

🌷 पदार्थः कोश-आधारित

विद्या ➤ ज्ञान, अवगम, शिक्षा, विज्ञान
संस्कृत: ज्ञानम्

ददाति ➤ देना, सौंपना
संस्कृत: दाने

विनयं ➤ डाला हुआ, फेंका हुआ

विनयात् ➤ डाला हुआ, फेंका हुआ

याति ➤ जाना
संस्कृत: प्रापणे

पात्रताम् ➤ पीने का बर्तन, प्याला, गिलास

पात्रत्वात् ➤ पीने का बर्तन, प्याला, गिलास

धनम् ➤ संपत्ति, दौलत, धन, निधि, रुपया
संस्कृत: द्रव्यम् · पर्याय: द्रव्य, वित्त, स्वापतेय, रिक्थ, ऋक्थ

आप्नोति ➤ व्याप्त होना, व्यापना
संस्कृत: व्याप्तौ

धनात् ➤ संपत्ति, दौलत, धन, निधि, रुपया
संस्कृत: द्रव्यम् · पर्याय: द्रव्य, वित्त, स्वापतेय, रिक्थ, ऋक्थ

धर्मं ➤ कर्तव्व, जाति, सम्प्रदाय आदि के प्रचलित आचार का पालन
संस्कृत: धर्मः · पर्याय: पुण्य, श्रेयस्, सुकृत, वृष, उपनिषद्

ततः ➤ से, वहाँ से

सुखम् ➤ प्रसन्न, आनन्दित, हर्षपूर्ण खुश
संस्कृत: आनन्दः · पर्याय: मुद्, प्रीति, प्रमद, हर्ष, प्रमोद

🌻 अन्वयः स्वचालित — अनुमानित

विद्या विनयं ददाति; विनयात् पात्रताम् याति; धनम् धर्मं पात्रत्वात् धनात् आप्नोति; ततः सुखम्।

ⓘ यह अन्वय विभक्ति, पुरुष-वचन व वाक्य-क्रम के नियमों से स्वतः बना है — काव्यार्थ के लिए गुरु/टीका से अवश्य मिलाएँ।

📢 भावार्थः

शब्दशः अर्थ (पद-क्रम में, स्वचालित)

विद्या = ज्ञान · ददाति = देना · विनयं = डाला हुआ · विनयात् = डाला हुआ · याति = जाना · पात्रताम् = पीने का बर्तन · पात्रत्वात् = पीने का बर्तन · धनम् = संपत्ति · आप्नोति = व्याप्त होना · धनात् = संपत्ति · धर्मं = कर्तव्व · ततः = से · सुखम् = प्रसन्न

ⓘ धाराप्रवाह भावार्थ (संस्कृत/हिन्दी/अंग्रेज़ी) लिखना केवल AI या विद्वान ही कर सकते हैं; यह साधन किसी बाहरी AI का प्रयोग नहीं करता। साइट के श्रीमद्भागवत के सभी १४,०९९ श्लोकों का पूर्ण भावार्थ उपलब्ध है — उनमें से कोई श्लोक लिखें तो भावार्थ स्वतः दिखेगा।

⚙️ व्याकरणम् स्वचालित

❖ सन्धिः

पदम्विच्छेदःसन्धिसूत्रम्
विनयाद्यातिविनयात् + यातिजश्त्व झलां जशोऽन्ते (८.२.३९)
पात्रत्वाद्धनमाप्नोतिपात्रत्वात् + धनम्जश्त्व झलां जशोऽन्ते (८.२.३९)
पात्रत्वाद्धनमाप्नोतिधनम् + आप्नोतिहल्-अच् संयोग —
धनाद्धर्मंधनात् + धर्मंजश्त्व झलां जशोऽन्ते (८.२.३९)

❖ समासः

कोई समस्त पद नहीं पहचाना गया (या पूरा सामासिक शब्द कोश में सीधे मिल गया)।

❖ कृदन्तः

  • विद्या: विद् + क्यप् — विध्यर्थक कृदन्त
  • धर्मं: घ्रियते लोकोऽनेन, धरति लोकं वा धृ + मन् (कोश-व्युत्पत्ति)
  • सुखम्: सुख + अच् (कोश-व्युत्पत्ति)

❖ तद्धितान्तः

  • पात्रताम्: पात्र + तल् (भाववाचक) (कोश-व्युत्पत्ति)
  • पात्रत्वात्: पात्र + त्व (भाववाचक) (कोश-व्युत्पत्ति)

विश्लेषण-समय: २.१ सेकण्ड

यह साधन कैसे काम करता है: सब कुछ इसी वेबसाइट के सर्वर पर होता है — कोई बाहरी API/AI नहीं, आपका श्लोक कहीं भेजा या सहेजा नहीं जाता। पदच्छेद पाणिनीय सन्धि-नियमों के उल्टे प्रयोग से, पदपरिचय लगभग ७.५ लाख शब्द-रूपों व १.२ लाख प्रातिपदिकों के कोश से, अर्थ आप्टे संस्कृत-हिन्दी कोश व अमरकोश से, और अन्वय विभक्ति-क्रम के नियमों से बनता है। स्वचालित होने से कहीं-कहीं विकल्प गलत चुना जा सकता है (हर पद के "अन्य सम्भावना" देखें); श्रीमद्भागवत के श्लोकों पर साइट की जाँची हुई टीका दिखती है।
शब्द-डेटा साभार: ashtadhyayi.com (शब्दरूप, धातुरूप, आप्टे संस्कृत-हिन्दी कोश, अमरकोश) · सूत्र-लिंक: लघुसिद्धान्तकौमुदी।
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