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🕉️ श्लोकार्थ-बोधिनी

॥ श्लोकानां विश्लेषिका ॥ — पदच्छेद, पदपरिचय, पदार्थ, अन्वय, भावार्थ व व्याकरण

मार्जयतु
✅ यह श्लोक श्रीमद्भागवत १.१.१ (श्रीसूतजीसे शौनकादि ऋषियोंका प्रश्न) है — अन्वय, अनुवाद व भावार्थ साइट की टीका से (जाँचे हुए)।

🔔 मूलश्लोकः

जन्माद्यस्य यतोऽन्वयादितरतश्चार्थेष्वभिज्ञः स्वराट् तेने ब्रह्म हृदा य आदिकवये मुह्यन्ति यत्सूरयः । तेजोवारिमृदां यथा विनिमयो यत्र त्रिसर्गोऽमृषा धाम्ना स्वेन सदा निरस्तकुहकं सत्यं परं धीमहि ॥

🌸 पदच्छेदः स्वचालित

जन्म+अद्यस्य।यतः+अन्वयात्+इतरतः+च+अर्थेषु+अभिज्ञः।स्वराट्।तेने।ब्रह्म।हृदा।य।आदिकवये।मुह्यन्ति।यत्+सूरयः।तेजः+वारि+मृदां।यथा।विनिमयः।यत्र।त्रि+सर्गः+अमृषा।धाम्ना।स्वेन।सदा।निरस्त-+कुहकं।सत्यं।परं।धी+महि

"+" = एक ही लिखित शब्द के भीतर सन्धि-विच्छेद · डैश (-) वाले = समास का पूर्वपद

🌹 पदपरिचयः स्वचालित

पदम्विवरणम्
जन्मजन्मन् (नपुं.) — प्रथमा विभक्ति, एकवचन
अन्य सम्भावना: जन्मन् (नपुं.) — द्वितीया विभक्ति, एकवचन | जन्मन् (नपुं.) — सम्बोधन, एकवचन | जन्म (नपुं.) — सम्बोधन, एकवचन
अद्यस्यअद्य (पुं.) — षष्ठी विभक्ति, एकवचन
अन्य सम्भावना: अद्य (नपुं.) — षष्ठी विभक्ति, एकवचन
यतःअव्ययम्
अन्य सम्भावना: यत् (नपुं.) — षष्ठी विभक्ति, एकवचन · कृदन्त: इ + शतृ | यत् (पुं.) — षष्ठी विभक्ति, एकवचन · कृदन्त: इ + शतृ | यत (पुं.) — प्रथमा विभक्ति, एकवचन · कृदन्त: यत् + अच्
अन्वयात्अनु + या धातु (अदादिगण, परस्मैपद) — लङ् लकार, प्रथम पुरुष, एकवचन
अन्य सम्भावना: अन्वय (पुं.) — पञ्चमी विभक्ति, एकवचन | अय (पुं.) — पञ्चमी विभक्ति, एकवचन · कृदन्त: अनु + अय् + अच् | अय (नपुं.) — पञ्चमी विभक्ति, एकवचन · कृदन्त: अनु + अय् + अच्
इतरतःइतरता (स्त्री.) — षष्ठी विभक्ति, एकवचन · तद्धित: इतर + तल् (भाववाचक)
अन्य सम्भावना: अव्ययम् | इतरता (स्त्री.) — पञ्चमी विभक्ति, एकवचन · तद्धित: इतर + तल् (भाववाचक) | इतरता (स्त्री.) — द्वितीया विभक्ति, बहुवचन · तद्धित: इतर + तल् (भाववाचक)
चअव्ययम्
अन्य सम्भावना: च (पुं.) — सम्बोधन, एकवचन
अर्थेषुअर्थ (पुं.) — सप्तमी विभक्ति, बहुवचन
अभिज्ञःअभिज्ञ (पुं.) — प्रथमा विभक्ति, एकवचन
स्वराट्स्वराज् (पुं.) — प्रथमा विभक्ति, एकवचन
अन्य सम्भावना: स्वराज् (पुं.) — सम्बोधन, एकवचन
तेनेतन् धातु (तनादिगण, आत्मनेपद) — लिट् लकार, प्रथम पुरुष, एकवचन
अन्य सम्भावना: तन् धातु (तनादिगण, आत्मनेपद) — लिट् लकार, प्रथम पुरुष, एकवचन · कर्मणि/भावे | तन् धातु (चुरादिगण, आत्मनेपद) — लिट् लकार, प्रथम पुरुष, एकवचन · कर्मणि/भावे | तन् धातु (तनादिगण, आत्मनेपद) — लिट् लकार, उत्तम पुरुष, एकवचन
ब्रह्मब्रह्मन् (नपुं.) — प्रथमा विभक्ति, एकवचन
अन्य सम्भावना: ब्रह्मन् (नपुं.) — द्वितीया विभक्ति, एकवचन | ब्रह्मन् (नपुं.) — सम्बोधन, एकवचन | ब्रह्म (नपुं.) — सम्बोधन, एकवचन
हृदाहृद् (नपुं.) — तृतीया विभक्ति, एकवचन
अन्य सम्भावना: हृदय (नपुं.) — तृतीया विभक्ति, एकवचन
यय (पुं.) — सम्बोधन, एकवचन
आदिकवयेआदिकवि (पुं.) — चतुर्थी विभक्ति, एकवचन
मुह्यन्तिमुह् धातु (दिवादिगण, परस्मैपद) — लट् लकार, प्रथम पुरुष, बहुवचन
अन्य सम्भावना: मुह्यत् (नपुं.) — प्रथमा विभक्ति, बहुवचन · कृदन्त: मुह् + शतृ | मुह्यत् (नपुं.) — द्वितीया विभक्ति, बहुवचन · कृदन्त: मुह् + शतृ | मुह्यन्ती (स्त्री.) — सम्बोधन, एकवचन · कृदन्त: मुह् + शतृ
यत्यद् (नपुं.) — प्रथमा विभक्ति, एकवचन
अन्य सम्भावना: यद् (नपुं.) — द्वितीया विभक्ति, एकवचन | यत् (नपुं.) — प्रथमा विभक्ति, एकवचन · कृदन्त: इ + शतृ | यत् (नपुं.) — द्वितीया विभक्ति, एकवचन · कृदन्त: इ + शतृ
सूरयःसूरि (पुं.) — प्रथमा विभक्ति, बहुवचन
अन्य सम्भावना: सूरि (पुं.) — सम्बोधन, बहुवचन
तेजःतेजस् (नपुं.) — प्रथमा विभक्ति, एकवचन
अन्य सम्भावना: तेजस् (नपुं.) — द्वितीया विभक्ति, एकवचन | तेजस् (नपुं.) — सम्बोधन, एकवचन | तेज (पुं.) — प्रथमा विभक्ति, एकवचन · कृदन्त: तेज् + अच्
वारिवारि (नपुं.) — प्रथमा विभक्ति, एकवचन
अन्य सम्भावना: वारि (नपुं.) — द्वितीया विभक्ति, एकवचन | वारि (नपुं.) — सम्बोधन, एकवचन | वार् (नपुं.) — प्रथमा विभक्ति, बहुवचन
मृदांमृद् (स्त्री.) — षष्ठी विभक्ति, बहुवचन
अन्य सम्भावना: मृदा (स्त्री.) — द्वितीया विभक्ति, एकवचन
यथाअव्ययम्
अन्य सम्भावना: यथा (स्त्री.) — प्रथमा विभक्ति, एकवचन | यथा (स्त्री.) — प्रथमा विभक्ति, बहुवचन | यथा (स्त्री.) — द्वितीया विभक्ति, बहुवचन
विनिमयःविनिमय (पुं.) — प्रथमा विभक्ति, एकवचन
यत्रअव्ययम्
त्रितॄ (पुं.) — सप्तमी विभक्ति, एकवचन
अन्य सम्भावना: त्रि (नपुं.) — प्रथमा विभक्ति, एकवचन | त्रि (नपुं.) — द्वितीया विभक्ति, एकवचन | त्रा (पुं.) — सप्तमी विभक्ति, एकवचन · कृदन्त: त्रै + अच्
सर्गःसर्ग (पुं.) — प्रथमा विभक्ति, एकवचन
अमृषाअव्ययम्
धाम्नाधामन् (नपुं.) — तृतीया विभक्ति, एकवचन
अन्य सम्भावना: धामन् (पुं.) — तृतीया विभक्ति, एकवचन
स्वेनस्व (पुं.) — तृतीया विभक्ति, एकवचन
अन्य सम्भावना: स्व (नपुं.) — तृतीया विभक्ति, एकवचन | स्वन् धातु (भ्वादिगण, परस्मैपद) — लिट् लकार, मध्यम पुरुष, बहुवचन
सदासद् (पुं.) — तृतीया विभक्ति, एकवचन
अन्य सम्भावना: सदा (स्त्री.) — प्रथमा विभक्ति, एकवचन · कृदन्त: सद् + अच् | अव्ययम् | सदस् (स्त्री.) — प्रथमा विभक्ति, एकवचन
निरस्तसमास-पूर्वपद (प्रातिपदिक निरस्त)
अन्य सम्भावना: निरस्त (नपुं.) — सम्बोधन, एकवचन | निरस्त (पुं.) — सम्बोधन, एकवचन
कुहकंकुहक (नपुं.) — प्रथमा विभक्ति, एकवचन (व्युत्पत्ति: कुह + ण्वुल्)
अन्य सम्भावना: कुहक (पुं.) — द्वितीया विभक्ति, एकवचन | कुहक (नपुं.) — द्वितीया विभक्ति, एकवचन
सत्यंसत्य (नपुं.) — प्रथमा विभक्ति, एकवचन
अन्य सम्भावना: सत्य (नपुं.) — द्वितीया विभक्ति, एकवचन | सत्य (पुं.) — द्वितीया विभक्ति, एकवचन | अव्ययम्
परंपर (नपुं.) — प्रथमा विभक्ति, एकवचन
अन्य सम्भावना: पर (पुं.) — द्वितीया विभक्ति, एकवचन | पर (नपुं.) — द्वितीया विभक्ति, एकवचन | पॄ धातु (चुरादिगण, परस्मैपद) — लङ् लकार, उत्तम पुरुष, एकवचन (माङ्योग में अट्-आगम का अभाव — न माङ्योगे)
धीधि (पुं.) — प्रथमा विभक्ति, द्विवचन
अन्य सम्भावना: धि (पुं.) — द्वितीया विभक्ति, द्विवचन | धि (पुं.) — सम्बोधन, द्विवचन
महिमही (स्त्री.) — सम्बोधन, एकवचन
अन्य सम्भावना: मह धातु (चुरादिगण, आत्मनेपद) — लुङ् लकार, प्रथम पुरुष, एकवचन · कर्मणि/भावे (माङ्योग में अट्-आगम का अभाव — न माङ्योगे) | महा (पुं.) — सप्तमी विभक्ति, एकवचन

🌷 पदार्थः कोश-आधारित

जन्म ➤ मनिन् जन्म
संस्कृत: जननम् · पर्याय: जनुस्, जनन, जनि, उत्पत्ति, उद्भव

अद्यस्य ➤ खाने के योग्य

यतः ➤ जहां से, जिस जगह से, जिस स्थान से या जिस दिशा से

अन्वयात् ➤ जाना
संस्कृत: प्रापणे

इतरतः ➤ दूसरा, अलग. भिन्न
संस्कृत: अन्यः, भिन्नः, नीचः, भिन्नार्थकाः

च ➤ और, भी, तथा, इसके अतिरिक्त

अर्थेषु ➤ आशय,प्रयोजन,लक्ष्य,उद्देश्य,अभिलाष,इच्छा
संस्कृत: द्रव्यम्, अभिधेयः, निवृत्तिः, प्रयोजनम्, वस्तु · पर्याय: द्रव्य, वित्त, स्वापतेय, रिक्थ, ऋक्थ

अभिज्ञः ➤ जानने वाला,जानकार,अनुभवशील,कुशल
संस्कृत: पर्याय: प्रवीण, निपुण, विज्ञ, निष्णात, शिक्षित

स्वराट् ➤ परमात्मा

तेने ➤ फैलाना, बढ़ाना
संस्कृत: विस्तारे

ब्रह्म ➤ ब्राह्मण, प्रजापति, वेद, तप
संस्कृत: ब्राह्मणः, प्रजापतिः, वेदतत्त्वम्, तपः · पर्याय: आत्मभू, सुरज्येष्ठ, परमेष्ठिन्, पितामह, हिरण्यगर्भ

हृदा ➤ हृत्, पृषो.तस्य दः, हृदयस्य हृदादेशो वा
संस्कृत: मनस्, हृदयकमलम् · पर्याय: चित्त, चेतस्, हृदय, स्वान्त, मानस

य ➤ जाने वाला, गन्ता

आदिकवये ➤ प्रथम कवि, ब्रह्मा की उपाधि क्योंकि उसी ने सर्वप्रथम कवियों का पथप्रदर्शन किया-जब कि उसने क्रौञ्च दम्पती के एक पक्षी को व्याध के द्वारा मारा जाता हुआ देखा, उसन…
संस्कृत: वाल्मीकिः · पर्याय: प्राचेतस्, मैत्रावरुणि, वाल्मीकि

मुह्यन्ति ➤ पागल होना, बुद्धि भ्रष्ट होना
संस्कृत: वैचित्त्ये

यत् ➤ जो
संस्कृत: बुद्धिविशेषनिर्दिष्टवस्तुवाचकसर्वनाम

सूरयः ➤ सूर्य

तेजः ➤ तेजी
संस्कृत: रेतस्, प्रभा, बलम्, प्रभावः · पर्याय: शुक्र, रेतस्, बीज, वीर्य, इन्द्रिय

वारि ➤ जल
संस्कृत: जलम् · पर्याय: अप्, वार्, सलिल, कमल, जल

मृदां ➤ पिंडोर, मिट्टी, मिट्टी का गारा
संस्कृत: मृत्तिका · पर्याय: मृत्तिका

यथा ➤ यद् प्रकारे थाल् कथितरीति के अनुसार

विनिमयः ➤ अदला-बदली, वस्तु के बदले वस्तु का लेन देन

यत्र ➤ जहां, जिस स्थान में, जिधर

त्रि ➤ अर्थ उपलब्ध नहीं
संस्कृत: तॄ (तरणे) इति धातुः

सर्गः ➤ छोड़ना, परित्याग
संस्कृत: स्वभावः, निर्मोक्षः, निश्चयः, अध्यायभेदः, सृष्टिः · पर्याय: संसिद्धि, प्रकृति, स्वरूप, स्वभाव, निसर्ग

अमृषा ➤ से नही,सचमुच।"

धाम्ना ➤ आवास-स्थान, गृह, निवासस्थान, घर
संस्कृत: गृहम्, किरणः, प्रभावः, देहः · पर्याय: गृह, गेह, उदवसित, वेश्मन्, सद्मन्

स्वेन ➤ स्वयम्, अपना
संस्कृत: आत्मा, आत्मीयम् · पर्याय: सगोत्र, बान्धव, ज्ञाति, बन्धु, स्वजन

सदा ➤ सभा

निरस्त ➤ दूर डाला हुआ, दूर फेंका हुआ, प्रत्याख्यात, हांका हुआ, निष्कासित, निर्वासित
संस्कृत: शीघ्रोच्चारितवचः · पर्याय: त्वरितोदित

कुहकं ➤ चालाकी, धोखा

सत्यं ➤ सच्चा, वास्तविक, असली, जैसा कि सत्यब्रत, सत्यसन्घ में
संस्कृत: सत्यवचनम् · पर्याय: तथ्य, ऋत, सम्यक्

परं ➤ दूसरा, भिन्न, अम्य
संस्कृत: परतीरम् · पर्याय: पार

धी ➤ आधार, भंडार, आशय आदि

महि ➤ पृथ्वी-जैसा कि महीपाल और महीभृत् आदि में
संस्कृत: भूमिः · पर्याय: भू, भूमि, अचला, अनन्ता, रसा

🌻 अन्वयः साइट-टीका

यतः अस्य जन्मादि (भवति), (यः) अन्वयात् इतरतः च अर्थेषु अभिज्ञः, स्वराट्, यः आदिकवये हृदा ब्रह्म तेने, यत् (विषये) सूरयः मुह्यन्ति, यथा तेजोवारिमृदां विनिमयः (तथा) यत्र त्रिसर्गः अमृषा (सत्यवत् प्रतीयते), स्वेन धाम्ना सदा निरस्तकुहकं (तत्) परं सत्यं धीमहि।

📢 भावार्थः

हिन्दी अनुवाद

जिनसे इस जगत् की उत्पत्ति, पालन और संहार होते हैं; जो सब पदार्थों में अनुगत रहकर भी उनसे पृथक् हैं; जो सर्वज्ञ और स्वयंप्रकाश हैं; जिन्होंने आदिकवि ब्रह्माजी के हृदय में संकल्प मात्र से वेद का ज्ञान प्रकट किया; जिनके विषय में बड़े-बड़े विद्वान् भी मोहित हो जाते हैं; जैसे सूर्य-किरणों में जल का, जल में स्थल का और स्थल में जल का भ्रम होता है, वैसे ही जिनमें यह त्रिगुणमयी सृष्टि सत्य-सी प्रतीत होती है; जो अपने स्वरूप-प्रकाश से माया को सदा दूर रखते हैं — उन परम सत्य परमात्मा का हम ध्यान करते हैं।

भावार्थ

यह भागवत का मङ्गलाचरण है। इसमें किसी देवता का नाम न लेकर 'परम सत्य' का ध्यान किया गया है, जो ब्रह्मसूत्र के 'जन्माद्यस्य यतः' सूत्र और गायत्री के 'धीमहि' पद की याद दिलाता है। भाव यह है कि सृष्टि का कारण, सर्वज्ञ, वेदों का मूल और माया से परे वही एक भगवान् हैं; संसार उन्हीं की सत्ता से सत्य जैसा दिखता है। पूरे ग्रन्थ का लक्ष्य इसी परम सत्य की प्राप्ति है।

⚙️ व्याकरणम् स्वचालित

❖ सन्धिः

पदम्विच्छेदःसन्धिसूत्रम्
जन्माद्यस्यजन्म + अद्यस्यदीर्घ अकः सवर्णे दीर्घः (६.१.१०१)
यतोऽन्वयादितरतश्चार्थेष्वभिज्ञःयतः + अन्वयात्पूर्वरूप (ऽ = लुप्त अ) एङः पदान्तादति (६.१.१०९)
यतोऽन्वयादितरतश्चार्थेष्वभिज्ञःअन्वयात् + इतरतःजश्त्व झलां जशोऽन्ते (८.२.३९)
यतोऽन्वयादितरतश्चार्थेष्वभिज्ञःइतरतः + चविसर्ग → श् स्तोः श्चुना श्चुः (८.४.४०)
यतोऽन्वयादितरतश्चार्थेष्वभिज्ञःच + अर्थेषुदीर्घ अकः सवर्णे दीर्घः (६.१.१०१)
यतोऽन्वयादितरतश्चार्थेष्वभिज्ञःअर्थेषु + अभिज्ञःयण् इको यणचि (६.१.७७)
तेजोवारिमृदांतेजः + वारिविसर्ग → उ (हशि च) हशि च (६.१.११४)
त्रिसर्गोऽमृषासर्गः + अमृषापूर्वरूप (ऽ = लुप्त अ) एङः पदान्तादति (६.१.१०९)

❖ समासः

  • निरस्तकुहकं = निरस्त + कुहकं तत्पुरुष/कर्मधारय/बहुव्रीहि — प्रकार अर्थ पर निर्भर

ⓘ समास के खण्ड कोश से पहचाने गए हैं; विग्रह-वाक्य व समास-प्रकार (तत्पुरुष/बहुव्रीहि आदि) अर्थ पर निर्भर करता है।

❖ कृदन्तः

  • ब्रह्म: बृंह् + मनिन् (कोश-व्युत्पत्ति)
  • य: या + ड (कोश-व्युत्पत्ति)
  • तेजः: तिज् + असुन् (कोश-व्युत्पत्ति)
  • मृदां: मृद् + क्विप् (कोश-व्युत्पत्ति)
  • विनिमयः: वि + नि + मी + अप् (कोश-व्युत्पत्ति)
  • सर्गः: सृज् + घञ् (कोश-व्युत्पत्ति)
  • सदा: सद्+क्विप् (कोश-व्युत्पत्ति)
  • कुहकं: कुह + ण्वुल् — कर्तृवाचक कृदन्त
  • परं: पृ.+ अप्, कर्तरि अच् वा (कोश-व्युत्पत्ति)

❖ तद्धितान्तः

  • अद्यस्य: अद्+यत् (कोश-व्युत्पत्ति)
  • इतरतः: इतर + तल् (भाववाचक) (कोश-व्युत्पत्ति)
  • अभिज्ञः: अभि+ज्ञा+क (कोश-व्युत्पत्ति)
  • वारि: वृ + इञ् (कोश-व्युत्पत्ति)
  • सत्यं: सते हितम् - सत् + यत् (कोश-व्युत्पत्ति)

विश्लेषण-समय: ४.४ सेकण्ड

यह साधन कैसे काम करता है: सब कुछ इसी वेबसाइट के सर्वर पर होता है — कोई बाहरी API/AI नहीं, आपका श्लोक कहीं भेजा या सहेजा नहीं जाता। पदच्छेद पाणिनीय सन्धि-नियमों के उल्टे प्रयोग से, पदपरिचय लगभग ७.५ लाख शब्द-रूपों व १.२ लाख प्रातिपदिकों के कोश से, अर्थ आप्टे संस्कृत-हिन्दी कोश व अमरकोश से, और अन्वय विभक्ति-क्रम के नियमों से बनता है। स्वचालित होने से कहीं-कहीं विकल्प गलत चुना जा सकता है (हर पद के "अन्य सम्भावना" देखें); श्रीमद्भागवत के श्लोकों पर साइट की जाँची हुई टीका दिखती है।
शब्द-डेटा साभार: ashtadhyayi.com (शब्दरूप, धातुरूप, आप्टे संस्कृत-हिन्दी कोश, अमरकोश) · सूत्र-लिंक: लघुसिद्धान्तकौमुदी।
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