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🕉️ श्लोकार्थ-बोधिनी

॥ श्लोकानां विश्लेषिका ॥ — पदच्छेद, पदपरिचय, पदार्थ, अन्वय, भावार्थ व व्याकरण

मार्जयतु

🔔 मूलश्लोकः

यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत । अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम् ॥

🌸 पदच्छेदः स्वचालित

यदा+यदा।हि।धर्मस्य।ग्लानिः+भवति।भारत।अभ्युत्थानम्+अधर्मस्य।तदा+आत्मानं।सृजामि+अहम्

"+" = एक ही लिखित शब्द के भीतर सन्धि-विच्छेद · डैश (-) वाले = समास का पूर्वपद

🌹 पदपरिचयः स्वचालित

पदम्विवरणम्
यदाअव्ययम्
यदाअव्ययम्
हिअव्ययम्
धर्मस्यधर्म (पुं.) — षष्ठी विभक्ति, एकवचन
अन्य सम्भावना: धर्म (नपुं.) — षष्ठी विभक्ति, एकवचन
ग्लानिःग्लानि (स्त्री.) — प्रथमा विभक्ति, एकवचन
भवतिभू धातु (भ्वादिगण, परस्मैपद) — लट् लकार, प्रथम पुरुष, एकवचन
अन्य सम्भावना: भू धातु (चुरादिगण, परस्मैपद) — लट् लकार, प्रथम पुरुष, एकवचन | भवत् (पुं.) — सप्तमी विभक्ति, एकवचन · कृदन्त: भू + शतृ | भवती (स्त्री.) — सम्बोधन, एकवचन
भारतभारत (पुं.) — सम्बोधन, एकवचन
अन्य सम्भावना: भारत (नपुं.) — सम्बोधन, एकवचन
अभ्युत्थानम्अभ्युत्थान (नपुं.) — प्रथमा विभक्ति, एकवचन
अन्य सम्भावना: अभ्युत्थान (नपुं.) — द्वितीया विभक्ति, एकवचन
अधर्मस्यअधर्म (पुं.) — षष्ठी विभक्ति, एकवचन
अन्य सम्भावना: अधर्म (नपुं.) — षष्ठी विभक्ति, एकवचन
तदाअव्ययम्
आत्मानंआत्मन् (पुं.) — द्वितीया विभक्ति, एकवचन
अन्य सम्भावना: आत्मन् (स्त्री.) — द्वितीया विभक्ति, एकवचन
सृजामिसृज् धातु (तुदादिगण, परस्मैपद) — लट् लकार, उत्तम पुरुष, एकवचन
अहम्अस्मद् (त्रि.) — प्रथमा विभक्ति, एकवचन
अन्य सम्भावना: अह (नपुं.) — प्रथमा विभक्ति, एकवचन · कृदन्त: अह् + अच् | अह (पुं.) — द्वितीया विभक्ति, एकवचन · कृदन्त: अह् + अच् | अह (नपुं.) — द्वितीया विभक्ति, एकवचन · कृदन्त: अह् + अच्

🌷 पदार्थः कोश-आधारित

यदा ➤ जब, उस समय जब कि

यदा ➤ जब, उस समय जब कि

हि ➤ (इसका प्रयोग वाक्य के आरम्भ में कभी नहीं होता) इसके अर्थ निम्नांकित हैः- इसलिए कि, क्योंकि (तर्कसंगत युक्ति का निर्देश करना)

धर्मस्य ➤ कर्तव्व, जाति, सम्प्रदाय आदि के प्रचलित आचार का पालन
संस्कृत: वेदविहितकर्माः, आचारः, नीतिः, पुण्यम्, सोमयाजिः, स्वभावः, यमः, धर्मः · पर्याय: पुण्य, श्रेयस्, सुकृत, वृष, उपनिषद्

ग्लानिः ➤ अवसाद, क्लान्ति, थकावट

भवति ➤ होना
संस्कृत: सत्तायाम्

भारत ➤ भरत से संबन्ध रखने वाला या भरत की सन्तान

अभ्युत्थानम् ➤ सत्कारार्थ उठाना,किसी के सम्मान मे खड़े होना
संस्कृत: उत्थानपूर्वकसत्कारः · पर्याय: गौरव

अधर्मस्य ➤ बेईमानी, दुष्टता, अन्याय; अधर्मेण- अन्यायपूर्वक

तदा ➤ तब, उस समय

आत्मानं ➤ स्वयम्, आत्मा, ब्रह्मा, बुद्धि, स्वभाव, देह, धारणा / धैर्य, प्रयत्न
संस्कृत: स्वयम्, आत्मा, ब्रह्मा, बुद्धिः, स्वभावः, देहः, धृतिः, यत्नः · पर्याय: क्षेत्रज्ञ, पुरुष, भाव, स्व

सृजामि ➤ रचना करना, बनाना
संस्कृत: विसर्गे

अहम् ➤ मैं
संस्कृत: अहम्

🌻 अन्वयः स्वचालित — अनुमानित

(हे) भारत! यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिः अधर्मस्य अभ्युत्थानम् भवति; तदा अहम् आत्मानं सृजामि।

ⓘ यह अन्वय विभक्ति, पुरुष-वचन व वाक्य-क्रम के नियमों से स्वतः बना है — काव्यार्थ के लिए गुरु/टीका से अवश्य मिलाएँ।

📢 भावार्थः

शब्दशः अर्थ (पद-क्रम में, स्वचालित)

यदा = जब · यदा = जब · हि = (इसका प्रयोग वाक्य के आरम्भ में कभी नही… · धर्मस्य = कर्तव्व · ग्लानिः = अवसाद · भवति = होना · भारत = भरत से संबन्ध रखने वाला या भरत की सन्तान · अभ्युत्थानम् = सत्कारार्थ उठाना · अधर्मस्य = बेईमानी · तदा = तब · आत्मानं = स्वयम् · सृजामि = रचना करना · अहम् = मैं

ⓘ धाराप्रवाह भावार्थ (संस्कृत/हिन्दी/अंग्रेज़ी) लिखना केवल AI या विद्वान ही कर सकते हैं; यह साधन किसी बाहरी AI का प्रयोग नहीं करता। साइट के श्रीमद्भागवत के सभी १४,०९९ श्लोकों का पूर्ण भावार्थ उपलब्ध है — उनमें से कोई श्लोक लिखें तो भावार्थ स्वतः दिखेगा।

⚙️ व्याकरणम् स्वचालित

❖ सन्धिः

पदम्विच्छेदःसन्धिसूत्रम्
ग्लानिर्भवतिग्लानिः + भवतिविसर्ग → र् ससजुषो रुः (८.२.६६)
अभ्युत्थानमधर्मस्यअभ्युत्थानम् + अधर्मस्यहल्-अच् संयोग —
तदात्मानंतदा + आत्मानंदीर्घ अकः सवर्णे दीर्घः (६.१.१०१)
सृजाम्यहम्सृजामि + अहम्यण् इको यणचि (६.१.७७)

❖ समासः

कोई समस्त पद नहीं पहचाना गया (या पूरा सामासिक शब्द कोश में सीधे मिल गया)।

❖ कृदन्तः

  • धर्मस्य: घ्रियते लोकोऽनेन, धरति लोकं वा धृ + मन् (कोश-व्युत्पत्ति)
  • भारत: भरत+अण् (कोश-व्युत्पत्ति)
  • अभ्युत्थानम्: अभि+उत्+स्था+ल्युट् (कोश-व्युत्पत्ति)

❖ तद्धितान्तः

कोई तद्धितान्त पद नहीं पहचाना गया।

विश्लेषण-समय: १.४ सेकण्ड

यह साधन कैसे काम करता है: सब कुछ इसी वेबसाइट के सर्वर पर होता है — कोई बाहरी API/AI नहीं, आपका श्लोक कहीं भेजा या सहेजा नहीं जाता। पदच्छेद पाणिनीय सन्धि-नियमों के उल्टे प्रयोग से, पदपरिचय लगभग ७.५ लाख शब्द-रूपों व १.२ लाख प्रातिपदिकों के कोश से, अर्थ आप्टे संस्कृत-हिन्दी कोश व अमरकोश से, और अन्वय विभक्ति-क्रम के नियमों से बनता है। स्वचालित होने से कहीं-कहीं विकल्प गलत चुना जा सकता है (हर पद के "अन्य सम्भावना" देखें); श्रीमद्भागवत के श्लोकों पर साइट की जाँची हुई टीका दिखती है।
शब्द-डेटा साभार: ashtadhyayi.com (शब्दरूप, धातुरूप, आप्टे संस्कृत-हिन्दी कोश, अमरकोश) · सूत्र-लिंक: लघुसिद्धान्तकौमुदी।
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